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विवाह और विवशता

17  बरस की थी जब मेरा विवाह दिल्ली के किसी परिवार के साथ मुझसे बिना पूछे तय कर दिए गया । यूँ तोह मेरा आगे  आगे पढ़ने लिखने का विचार था परन्तु घर मे लड़कियों की सुनता कौन है । जब मैंने अपने आगे पढ़ने की बात घर मे सबको बताई तोह भाई ने मुझे पीटना शुरू करदिया  । वो कहता  “अब तेरा पति ही तेरे लिए  सब कुछ है । ससुराल चली जा, फिर वहाँ जो करना है कर ।” ये सुनकर मैं निराश  ज़रूर हुई मगर किसी भी अनहोनी  से अनजान मैंने आने वाले कल का खुले दिल से स्वागत करना ही बेहतर समझा । कहते है शादी के बाद लड़की पराये घर की अमानत हो जाती है । उसका पति उसका परमेश्वर होता है ।  याद है वो रात जब पति होने की सारी मर्यादाएं  लांघकर  कैसे उसने हैवान का रूप धारण  कर लिया था । आज भी उस रात की हलकी सी आहात पूरी तस्वीर बनकर आँखों के  सामने आ जाती है । मेरे लिए शादी का पहिया  केवल लाली, बिंदी और नयी साड़ियों के बीच ही घूमता रहता । मेरा मन बंद कमरे के पीछे औरत और मर्द के जिस्मानी रिश्तों से अनजान था । जब  भी उन रातों का हिसाब करने बैठती हूँ मेरे रोंगटे खड़े हो जाते है। उसका  दिया हर ज़ख़्म हर दर्द ताज़ा हो जाता है । जैसे एक पक्षी पिंजरे मे बंद आज़ादी से पंख फ़ैलाने के लिए फड़फड़ाता है वैसे ही मेरा शरीर खुली हवा मे सांस लेने को बेचैन रहता । मैं भी  उस पक्षी की तरह ही अपने ही घर मे आज़ादी के इन्तिज़ार मे व्याकुल रहती ।

हर रात उसके एक एहसास से ही मेरा शरीर थर्र थर्र कांप उठता । अपने देह की भूक शांत करने के लिए वो मेरी भावनाओं का कभी ध्यान ना रखता । बिलकुल एक कैदी की तरह ही उसने मुझे अपनी बनाई बेड़ियों से जकड रखा था । हर रात वो जब मेरे बदन को छूता मैं बेसहारा महसूस करती ।  एक गुलाम की तरह ही उसने मुझे अपने पिंजरे मे कैद कर रखा था । मैं अंदर ही अंदर से टूटने लगी थी । मेरा मेरे शरीर से हक्क मिट गया था । बलात्कार हो जाना एक महिला के लिए मौत आ जाने से भी बड़ी बात है । बलात्कार के वक्त जिस जिस हैवानियत का मुझे एहसास हुआ वो नाकाफी है उस दर्द के सामने जो रेप के बाद  उम्र भर सहना पड़ता है । हैवानियत की हदें पार कर रोज़ मेरा बलातकार करता । ज़बरदस्ती मुझे छूता , मुझे मारता और पीटता ।  वो  राक्षस की तरह ही मुझपर हावी हो जाता ।  मेरे बदन की गहराईयों को छूता उसका हर एक स्पर्श मेरी आत्मा को भीतर से तबाह कर देता । एक औरत दलीले पेश नहीं कर सकती बस आंसुओं के ज़रिये दुःख बयान कर सकती है । मेरे लिए वाकई वो रातें अँधेरी और बेनाम थी ।

मैं बिस्तर पर  बदहवास हालत मे पड़ी रहती । मेरे साथ हर रात जो उस बिस्तर पर गठित होता वो बेहद दर्दनाक और रूह को झकझौरकर रख देता । उसने मेरे साथ जो किया वो वैवाहिक दुष्कर्म था । वो दुष्कर्म जिसके लिए शादी का लइसेंस होना अनिवार्य है  । इस लइसेंस के बिना सम्बन्ध को परिवार, समाज, कानून अवैध मानता है, मगर शादी के बाद यही अपराध  ज़बरदस्ती किया जाए तोह वो पति का अधिकार बन जाता है ।

समाज मे मेरे जैसी कई और होंगी जो इस दर्द को मेरी ही तरह बिना विरोध करे चुपचाप पी जाती होंगी ।  शादी की आड़ मे अपने साथ हो रहे दुष्कर्म की मै आदि हो चुकी थी । अपने गुलाम की तरह ही मेरे इस शरीर पर वो अपना हक़  जमा चुका था । पर मैं भी  क्या कर सकती थी, था तोह वो मेरा पति ही । उसे छोड़ देती तोह जीवन किसके सहारे गुज़रता । हर रात उसके साथ चार दीवारी मे कैद मैं बहुत  रोती । अब तोह आंसूं भी बस मेरी आँखों से निकल नज़ारा देख रहे थे ।  मैं  भावनाओ के धारे मे बह जाती एक प्यासी बन रह गयी । रोता बिलबिलाता मेरा बदन इतना नग्न महसूस करता की मानो चारो  ओर से लोग मुझे ही देख रहे हो ।  ऐसा लगा की मानो मेरे  अस्तित्व को किसी ने ओखली मे डालकर कूट दिया हो । वो सारी लज्जतें जिससे मैं  अपरिचित थी मेरे  दिल और दिमाग मे चक्कर लगा रही थी । उसने ना केवल मुझे शारीरिक बल्कि मानसिक रूप से भी नष्ट कर दिया था । एक महिला के शरीर के साथ बिना उसकी मर्जी के यौन सुख के लिये दुराचार करना या लगातार ये घिनौना कार्य करना वैयक्तिक गरिमा का उल्लंघन है।

दुःख तोह इस बात का है की आज तक हमारा कानून वैवाहिक बलातकार को अपराध की दृष्टि से देखने मे असफल रहा है । अपने ही पति द्वारा यौन हिंसा से पीड़ित मेरे पास कही जाने का स्थान नहीं था । और समाज के दबाव के कारण इसकी शिकायत अपने परिवार मे भी नहीं कर सकती थी ।

About the author

Shivangi Saxena

A dropout from society's norms and culture, she chose to be herself. She loves to socialize but solitude caresses her better. She proudly write her true instincts and doesn't believe in conventional way of writing.

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