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किन्नर और वैश्यावृत्ति

मैंने चाँद को सूरज निगलते देखा है सिक्कों की खनक पर ज़िंदा लाशों को बिकते देखा है।

कीचड मे पैर रखो तोह छीटे तुमपर ही गिरती है। वेश्यावृत्ति को भारत मे कानूनी रूप से मंज़ूरी ज़रूर मिल गयी हो परन्तु समाज के भीतर एक वेश्या का स्थान काले अक्षरों मे ही लिखा मटमैला रचित है। एक किन्नर की कल्पना करते ही हमारे मन मे बहुत सी जिज्ञासाए पैदा हो जाती है। एक किन्नर ना ही पूर्ण रूप से स्त्री है ना किसी पुरुष की परछाई। शायद इसी कल्पना को ठैराव लगाने किन्नर वैश्यावृत्ति का जन्म सदियों से चला आ रहा है। आज भी ऐसी दुनिया मौजूद है जहाँ दिन का उजाला ढलते ही, इनकी दुनिया जवां हो जाती है। शाम ढलते ही मोलभाव का सिलसिला आरम्भ हो जाता है। जानकारी के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट के एक और दो जजों की खंड पीठ ने मौलिक अधिकारों को सुदृढ़ करने वाले जुलाई 2014 के एक निर्णय में ट्रांसजेंडर्स को कई सारे अधिकार दिए। इन अधिकारों में राज्य द्वारा भेदभाव से मुक्ति, समान रोजगार और शिक्षा के अवसर, पुरुष और स्त्री से अलग एक तीसरे लिंग की मान्यता सहित कई विशेषाधिकार, सरकारी नौकरियों में और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण, और राज्य द्वारा ट्रांसजेंडर कल्याण बोर्ड की स्थापना करने का निर्देश मुख्य है। सुप्रीम कोर्ट यह फैसला ट्रांसजेंडरों को महज तीसरे लिंग के रूप में पहचान ही नहीं बल्कि उनके आत्म-पहचान के आधार पर उनके स्वयं के लिंग को तय करने के उनके अधिकार को भी मान्यता देता है। यानि कोई भी ट्रांसजेंडर व्यक्ति पुरुष, महिला या तीसरे लिंग के रूप में अपनी इच्छा से अपनी पहचान करा सकता है। बेरोज़गारी, शिक्षा की असहूलियत, परिवार मे उपेक्षा अवं समाज मे अपमान के चलते वैश्यावृत्ति के आंगन की छावनी मे अपना डेरा जमाने पर ये बेबस है। जब डूबती नाव को भरे समुद्र मे भी काफिला ना दिखे, तब डूब जाना ही सही लगता है. और शायद इसिलिए एक किन्नर किनारा खोजते- खोजते एक दिन वैश्यावृत्ति के दलदल मे फंस जाती है। एक औरत आसुओं के ज़रिये दलीले पेश कर सकती है परन्तु एक किन्नर का दर्द किस खेल का हिस्सा बने? इनका जीवन ट्रैन के उस डिब्बे के समान है जो इंजन द्वारा तेज़ धक्का लगने के कारण कभी तिरछी तोह कभी सीधी सुनसान सड़कों पर अपनी मंज़िल को ढूंढ़ती भटकती रहती। आँखों की नमी मे लज्जा और अपना खोता वजूद छिपाये हर रात जिस्मानी रिश्तों की पहेली मे उलझती इनकी ज़िंदगियाँ समाज का काला सच है। उसका दिल भी चीखता है, जैसे कोई उसके ह्रदय को हथोड़े से पीट रहा हो। ऐसा लगता है की मानो उनके अस्तित्व को समाज ने ओखली मे डालकर कूट दिया हो। हर रात कम्बल से ढाका उनका बदन इतना नग्न महसूस करता है की मानो चारो ओर से लोग उन्हें ही देख रहे हो। अगर ये दुनिया चौराहा है तोह उँगलियाँ उस ओर क्यों नहीं उठती जहा समाज खुद खड़ा है? क्या सबकी उँगलियाँ रास्ता भटक गयी है?

 

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Shivangi Saxena

A dropout from society's norms and culture, she chose to be herself. She loves to socialize but solitude caresses her better. She proudly write her true instincts and doesn't believe in conventional way of writing.

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